1 फ़रवरी 2020 - 16:24
मस्जिदुल अक़सा को अपनी दुआ में भूले काबे के इमाम, जान बूझ कर भोले बन रहे हैं सुदैस, जुमे के ख़ुतबे को लेकर सोशल मीडिया पर भारी ह

काबे के इमाम शैख़ डाक्टर अब्दुर्रहमान सुदैस ने कल जुमे की नमाज़ का ख़ुतबा दिया और उसमें बहुत सी बातें कहीं लेकिन डील आफ़ सेंचुरी का कोई उल्लेख नहीं किया और मस्जिदुल अक़सा के लिए दुआ नहीं की जो वह हमेश करते थे।

इस पर सोशल मीडिया पर भारी हंगामा मच गया है। सुदैस ने अपने ख़ुतबे में कहा कि आज जब विचारों की लड़ाई का दौर है तो नई धार्मिक विचारधारा का विषय बहुत महत्वपूर्ण है। इस्लाम धर्म में कृपा, आसानी और विवेक को प्राथमिकता दी गई है और यह प्रगतिशील धार्मिक विचारधारा है शिथिल नहीं है।

सुदैस का कहना था कि इस्लाम में हर ज़माने के हिसाब से बदलाव की गुंजाइश है लेकिन मूल सिद्धांतों में नहीं बल्कि उनको लागू करने और उन पर अमल करने के माध्यमों में बदलाव किया जाना है।

सुदैस ने ख़ुतबे के आख़िर में दुआ करवाई की हे पालनहार इस्लामी समुदाय की मुसबतों को दूर कर दे लेकिन उन्होंने वह दुआ नहीं करवाई जो इससे पहले तक करवाया करते थे। सुदैस आम तौर पर इससे पहले तक अपने ख़ुतबों में मस्जिदुल अक़सा का उल्लेख करते थे और दुआ करवाते थे कि हे पालनहार इस मस्जिद को ज़ायोनियों के क़ब्ज़े से मुक्ति दिला दे।

सुदैस के ख़ुतबे में नज़र आने वाले इस बदलाव को लेकर सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई। लोगों का यह कहना है कि इस समय जब सेंचुरी डील का मुद्दा गर्म है और इस भयानक साज़िश के ज़रिए फ़िलिस्तीन का नाम ही मिटा देने की कोशिश की जा रही है तो इस समय सुदैस जैसे धर्म गुरुओं ही नहीं आम मुसलमान को भी फ़िलिस्तीन और मस्जिदुल अक़सा की चिंता होनी चाहिए मगर सुदैस मस्जिदुल अक़सा को पूरी तरह भूल गए। कुछ लोगों ने लिखा कि सुदैस को उस महल, लंबी गाड़ी और भारी रक़म की चिंता है जो उन्हें सऊदी सरकार की ओर से मिली है। अगर उन्होंने डील आफ़ सेंचुरी के ख़िलाफ़ कुछ बोल दिया तो इन सारी चीज़ों से हाथ धोना पड़ जाएगा क्योंकि सेंचुरी डील जहां अमरीका ने तैयार की है वहीं इस डील का भरपूर समर्थन सऊदी अरब, इमारात, बहरैन और ओमान जैसे देशों ने किया है।

कुछ लोगों ने अपने कमेंट में यह याद दिलाया है कि काबे के इमाम को यह सोचना चाहिए कि जीवन का अधिक भाग गुज़र चुका है थोड़ा बचा है आख़िरकार उन्हें इस दुनिया से जाना है तो सांसारिक लोभ में पड़कर मस्जिदुल अक़सा को भूल जाना बहुत बड़ी मूर्खता है।